“अगर शेर हिरण को मारने की चिंता करने लगे तो?”
यह प्रश्न एक गहरी सच्चाई की ओर इशारा करता है।
प्रकृति में हर जीव अपने सहज धर्म के अनुसार जीता है—
शेर शिकार करता है, लेकिन न अहंकार से, न लालच से।
वह सिर्फ उतना ही करता है जितना आवश्यक है।
पर इंसान…
इंसान अपने सहज स्वभाव से दूर हो चुका है।
वह अब आवश्यकता से नहीं,
बल्कि अहंकार, लोभ, ईर्ष्या और द्वेष से जीने लगा है।
इसी कारण वह अपने और पूरी प्रकृति के विनाश का कारण बन रहा है।
यहीं से सवाल उठता है—
“मनुष्य जैसा सहज जीवन कैसे जिया जाए?”
कहा जाता है कि इसका मार्ग मुरशिद दिखाता है।
मुरशिद इंसान को यह समझाता है कि
जीवन को सही दृष्टि से कैसे देखा जाए,
और इंसान जैसा जीवन कैसे जिया जाए।
लेकिन यह रास्ता इतना आसान नहीं है
कि कोई और समझे और हम बस चल पड़ें।
चलना खुद को ही पड़ता है।
मुरशिद सहारा नहीं,
बल्कि दिशा है।
वह सिखाता है कि
अपने भीतर के अहंकार, क्रोध और इच्छाओं को पहचानो,
उन्हें धीरे-धीरे हटाओ,
और अपने असली स्वरूप को जानो।
तब इंसान समझता है कि
सहज जीवन कहीं बाहर नहीं है—
वह पहले से ही उसके भीतर मौजूद है।
असल में सहज होना कठिन नहीं है,
हम बस जटिलता के आदी हो चुके हैं।और अंत में—
“सहज अवस्था में लौटना ही
सबसे बड़ी क्रांति है।”

