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प्रयास
जीवन मेरा हो,पर मार्ग मेरे सतगुरु वाला हो। ऐसा मार्ग…जहाँ हर इंसान को प्रेम से देखा जाए,जहाँ करुणा शब्द नहीं — स्वभाव बन जाए,जहाँ निर्मलता मन की पहचान हो,और दया हर व्यवहार में दिखाई दे। मेरे सतगुरु का जीवन यही सिखाता है किकिसी के प्रति नफ़रत, घृणा, ईर्ष्या, द्वेष या अहंकार रखे बिना भीइस संसार…
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‘दुनिया’ — ख़ंजर से मरहम लगाती है
दुनिया का तरीका बड़ा अजीब है—यह पहले ज़ख़्म देती है, फिर उसी पर मरहम लगाने का दिखावा करती है। यहाँ रिश्ते भी अक्सर सौदे जैसे हो जाते हैं,जहाँ अपनापन शब्दों में होता है, और मतलब इरादों में छुपा रहता है।कभी कोई अपना बनकर दिल के क़रीब आता है,और फिर वही किसी दिन ख़ंजर बनकर भीतर…
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खुद से पूछा गया सवाल
जो जीवन मैं जी रहा हूँ, अगर मुझे ठीक लगता है…क्या वही सबको भी वैसा ही लगना चाहिए? जो मैं सोचता हूँ, अगर मुझे सही लगता है…क्या हर किसी को वैसा ही सोचना चाहिए? जो मैं खाता हूँ, जो मेरी आदतें हैं,मेरा जीने का तरीका—क्या वही सबके लिए “सही” रास्ता है? अगर “मुझे अच्छा लगता…
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क्या इस दुनिया को इंसान की ज़रूरत है!?
इंसान ने सही जीवन जीना भुला दिया है — सीमित, शांत और करुणामय जीवन। यही जीवन केवल मुरशिद की कृपा और मार्गदर्शन से प्राप्त होता है। धरती बिना इंसान के भी चलती रहेगी, पर इंसान अपने अहंकार और मोह-माया से मुक्त होकर ही असली अस्तित्व पा सकता है।
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अगर शेर हिरण को मारने की चिंता करने लगे तो?
“अगर शेर हिरण को मारने की चिंता करने लगे तो?”यह प्रश्न एक गहरी सच्चाई की ओर इशारा करता है। प्रकृति में हर जीव अपने सहज धर्म के अनुसार जीता है—शेर शिकार करता है, लेकिन न अहंकार से, न लालच से।वह सिर्फ उतना ही करता है जितना आवश्यक है। पर इंसान…इंसान अपने सहज स्वभाव से दूर…
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नफ़रत- खुद पर नहीं की जाती है
बात सुनने में सही लगती है —लेकिन पूरी सच्चाई थोड़ी गहरी है। “नफ़रत दूसरों पर की जाती है, खुद पर नहीं —पर उसका कष्ट और नाश खुद से ही प्रारंभ होता है।” असल में…जब इंसान किसी और से नफ़रत करता है,तो उसका ज़हर सबसे पहले खुद के अंदर फैलता है। हम सामने वाले को जलाना,…
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दो चेहरे — एक इंसान वाला, दूसरा राक्षस वाला
हर मनुष्य के बाहर एक सुंदर-सा चेहरा होता है, और भीतर दो रूप छिपे होते हैं।
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मन की जंग — जब जंग खुद से हो
सबसे कठिन जंग वह नहींजो दुनिया से लड़ी जाती है।सबसे कठिन जंग वह है —जब जंग खुद से हो। यह जंग बाहर नहीं होती,यह भीतर उठती है। न कोई रणभूमि,न कोई तलवार,न कोई रक्तपात —फिर भी यह मनुष्य को भीतर से तोड़ देती है। यह मन की जंग है।विचारों का टकराव।विश्वासों का बिखरना।भय का फैलना।अहंकार…





