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  • दो चेहरे — एक इंसान वाला, दूसरा राक्षस वाला

    हर मनुष्य के बाहर एक सुंदर-सा चेहरा होता है, और भीतर दो रूप छिपे होते हैं।

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  • मन की जंग — जब जंग खुद से हो

    सबसे कठिन जंग वह नहींजो दुनिया से लड़ी जाती है।सबसे कठिन जंग वह है —जब जंग खुद से हो। यह जंग बाहर नहीं होती,यह भीतर उठती है। न कोई रणभूमि,न कोई तलवार,न कोई रक्तपात —फिर भी यह मनुष्य को भीतर से तोड़ देती है। यह मन की जंग है।विचारों का टकराव।विश्वासों का बिखरना।भय का फैलना।अहंकार

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  • सुना था मैंने रावण भी एक ज्ञानी था।

    सुना था मैंने कि रावण भी एक बड़ा ज्ञानी था।फिर भी युगों-युगों से वह “राक्षस” के रूप में देखा जाता है। सोचने वाली बात यह है —क्या एक गलती ने उसे यह स्वरूप दे दिया?जब इस बात पर सूक्ष्म चिंतन करता हूँ, तो भीतर एक गहरा प्रश्न उठता है। ज्ञानी बनकर दिखना अलग बात है,पर

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  • समय छाँट देता है — दिखावे को नहीं, भाव और गहराई को

    जब भी ईश्वर साकार रूप में धरती पर अवतरित होते हैं, उनके जीवनकाल में लाखों लोग उनके संपर्क में आते हैं।वे उन्हें देखते हैं, सुनते हैं, मानते हैं और पूजते हैं। फिर भी समय बीतने के बाद इतिहास में केवल कुछ ही नाम शेष रह जाते हैं।ऐसा क्यों? समय दिखावे को नहीं बचाता — वह

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  • मोक्ष माँगती छाया का संदेश

    प्रियतम, तेरे जन्म के साथ ही मेरा जन्म हुआ।तेरी पहली चीख के साथ मैं भी धरती पर बिखर गई।तुझे लगता होगा कि तेरी माँ ने केवल तुझे जन्म दिया—पर उसने तेरे साथ मुझे भी इस संसार में भेजा। हम जुड़वाँ हैं।लेकिन दुनिया को दिखाई देता है केवल तू।तुझे कभी न छोड़ने वाली मौन साक्षी मैं

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  • ब्रह्म ज्ञान: केवल मनुष्य को ही इसकी आवश्यकता क्यों है?

    सभी जीवों में मनुष्य सबसे खतरनाक है — शक्ति के कारण नहीं, बल्कि चेतना के दुरुपयोग के कारण। मनुष्य स्वयं को भूल चुका है। उसने अपना वास्तविक स्वरूप खो दिया है। अंतर की शांति त्याग दी है। करुणा, प्रेम और दिव्यता अहंकार के नीचे दब गई है। उन्नति के नाम पर वह प्रभुत्व का नृत्य

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  • डर

    भय: जन्म से सहज अवस्था तक एक अंतर्यात्रा जन्म केवल जीवन की शुरुआत नहीं है — वह असुरक्षा का प्रथम स्पर्श भी है। पहली साँस सिर्फ हवा नहीं होती; वह इस सत्य का मौन संदेश है कि संसार सरल नहीं है। इस प्रकार भय मनुष्य के साथ ही जन्म लेता है। आरंभ में भय शत्रु

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