सबसे कठिन जंग वह नहीं
जो दुनिया से लड़ी जाती है।
सबसे कठिन जंग वह है —
जब जंग खुद से हो।
यह जंग बाहर नहीं होती,
यह भीतर उठती है।
न कोई रणभूमि,
न कोई तलवार,
न कोई रक्तपात —
फिर भी यह मनुष्य को भीतर से तोड़ देती है।
यह मन की जंग है।
विचारों का टकराव।
विश्वासों का बिखरना।
भय का फैलना।
अहंकार का स्वयं से भिड़ जाना।
यह वह स्थिति है
जब इंसान दो हिस्सों में बँट जाता है —
एक जो डरता है,
और एक जो लड़ना चाहता है।
एक जो भागना या खुद को समाप्त करना चाहता है,
और एक जो सत्य का सामना करना चाहता है।
इस युद्ध में दुश्मन भी स्वयं है,
और योद्धा भी स्वयं।
घाव भी भीतर लगते हैं,
और चीख भी भीतर दब जाती है।
बाहर से सब सामान्य दिखता है।
चेहरा मुस्कुराता है।
शरीर चलता है।
शब्द निकलते हैं।
पर भीतर — मन थक रहा होता है।
जब यह संघर्ष असहनीय हो जाए,
तब सतगुरु का महत्व समझ में आता है।
सतगुरु बाहरी सहारा नहीं,
भीतर के प्रकाश का दर्पण होता है।
वह लड़ाई को समाप्त नहीं करता —
वह योद्धा को जगा देता है।
सतगुरु की कृपा से मनुष्य समझता है
कि असली युद्ध किसी और से नहीं,
अपने अज्ञान से है।
जो स्वयं को जान लेता है,
वही ब्रह्मज्ञान को प्राप्त करता है।
वही जागृत होता है।
वही स्वयं (मन) पर विजय पा लेता है।
क्योंकि सबसे बड़ी जीत
स्वयं पर होती है।
