भय: जन्म से सहज अवस्था तक एक अंतर्यात्रा
जन्म केवल जीवन की शुरुआत नहीं है — वह असुरक्षा का प्रथम स्पर्श भी है। पहली साँस सिर्फ हवा नहीं होती; वह इस सत्य का मौन संदेश है कि संसार सरल नहीं है। इस प्रकार भय मनुष्य के साथ ही जन्म लेता है।
आरंभ में भय शत्रु नहीं था। जंगल, अंधकार और भूख ही उसके मूल कारण थे। वह भागने के लिए नहीं, बल्कि जीवित रहने की स्वाभाविक प्रतिक्रिया था। भय ने मनुष्य को सजग रहना सिखाया, और सजगता ने जीवन की रक्षा की। यहीं से अस्तित्व-बोध का अंकुर फूटा।
भय ने मनुष्य को सोचने पर विवश किया। विचारों ने समाधान खोजे। समाधानों ने साधनों का रूप लिया, और साधनों ने विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इस अर्थ में बुद्धि को भय की संतान कहा जा सकता है — भय न होता तो विकास भी न होता।
समय के साथ भय का स्वरूप बदल गया। समाज बना; नियम, अपेक्षाएँ और तुलनाएँ बढ़ीं। स्वीकृति आवश्यकता बन गई। अब भय बाहरी खतरे का नहीं रहा, बल्कि अपने स्थान को खो देने का हो गया। इस प्रकार भय मन में स्थायी हो गया।
जनसंख्या बढ़ी, पर पहचान घटने लगी। भीड़ के बीच भी अकेलापन बढ़ा। अदृश्य हो जाने का भय अस्तित्व को ही प्रश्न बना बैठा।
असफलता का भय प्रयास से पहले ही रोक देता है। कल्पित पराजय वास्तविक प्रयास को निगल जाती है। इस प्रकार भय विकास में भी बाधा बनने लगा।
आधुनिक युग में भय और सूक्ष्म हो गया। तकनीक की गति बढ़ी, पर मन उतनी शीघ्रता से विकसित न हो सका। पहचान, स्थान और भविष्य — सब अनिश्चित प्रतीत होने लगे। भय एक अदृश्य छाया बन गया।
भविष्य की अनिश्चितता मन को वर्तमान से दूर ले गई। भय आने वाले कल में बस गया और वर्तमान अस्थिर हो उठा।
परंतु एक प्रश्न सब कुछ बदल सकता है —
“मैं कौन हूँ?”
जब तक मनुष्य स्वयं को केवल शरीर मानता है, भय अनिवार्य है; क्योंकि शरीर नश्वर है, और नश्वरता ही भय का मूल है।
किन्तु जब यह प्रश्न उठता है — “इस शरीर को संचालित करने वाली शक्ति क्या है?” — तब भय के अंत की शुरुआत होती है। वह शक्ति आत्मा है — ईश्वर का अंश। और वह अंश अविनाशी है।
इस सत्य को तर्क से नहीं, अनुभव से जानने पर सहज अवस्था प्रकट होती है।
आत्मसाक्षात्कार गुरुकृपा से ही संभव है; क्योंकि भय मन और शरीर से संबंधित है, आत्मा से नहीं।
उस सहज अवस्था में
न चिंता रहती है,
न अनिश्चितता,
न भय।
वहाँ केवल जागरूकता होती है — और उसी जागरूकता में शांति स्वाभाविक रूप से प्रस्फुटित होती है।
