खुद से पूछा गया सवाल

जो जीवन मैं जी रहा हूँ, अगर मुझे ठीक लगता है…
क्या वही सबको भी वैसा ही लगना चाहिए?

जो मैं सोचता हूँ, अगर मुझे सही लगता है…
क्या हर किसी को वैसा ही सोचना चाहिए?

जो मैं खाता हूँ, जो मेरी आदतें हैं,
मेरा जीने का तरीका—
क्या वही सबके लिए “सही” रास्ता है?

अगर “मुझे अच्छा लगता है”
दूसरों पर भी लागू करने लगूँ,
तो क्या यह ज्ञान है… या सीधी-सी मूर्खता?

सच तो यह है—
हर इंसान अपनी-अपनी दृष्टि, परिस्थितियों और अनुभवों से बनता है।
तो फिर मैं क्यों चाहता हूँ कि
दुनिया वैसी ही हो जैसी मुझे पसंद है?

कोई अलग तरह से जीता है,
तो उससे मुझे वास्तव में क्या नुकसान है?

शायद सबसे बड़ी गलती यही है—
हर चीज़ को सिर्फ अपनी नज़र से देखना।

जीवन का सार यह नहीं कि
सब मेरे जैसे बन जाएँ,
बल्कि यह है कि मैं इतना विस्तृत बन जाऊँ
कि हर किसी को उसके रूप में स्वीकार कर सकूँ।

लेकिन मन की एक चाल है—
हर व्यक्ति भीतर ही भीतर मानता है:
“इस दुनिया में मुझसे बेहतर कोई नहीं।”
उसकी सोच श्रेष्ठ लगती है,
उसके कर्म पूर्ण लगते हैं।

फिर…
दूसरों की हर बात गलत लगने लगती है,
हर अलग तरीका असहनीय लगता है।

यहीं से जन्म लेते हैं—
ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार और कठोरता।

हम विनम्र रहने से पीछे हटते हैं,
क्योंकि लगता है कि समाज हमें कुचल देगा।
लेकिन सच्चाई कुछ और है—
विनम्रता कमजोरी नहीं,
बल्कि समझ और परिपक्वता का संकेत है।

ऐसे समय में…
मेरे लिए मेरे सत्गुरु का जीवन एक आदर्श है—
वही सच्चा जीवन मार्ग है—
जिसमें किसी के प्रति द्वेष, वैर या अहंकार नहीं,
जो हर किसी को प्रेम और विनम्रता से अपनाते हैं,
और सदा समदृष्टि से देखते हैं।

अंत में प्रश्न यह नहीं है—
“दुनिया मेरी पसंद के अनुसार क्यों नहीं है?”
बल्कि सच्चा प्रश्न यह है—

“क्या मैं दुनिया को उसके वास्तविक रूप में स्वीकार कर पा रहा हूँ?”