सुना था मैंने कि रावण भी एक बड़ा ज्ञानी था।
फिर भी युगों-युगों से वह “राक्षस” के रूप में देखा जाता है।
सोचने वाली बात यह है —
क्या एक गलती ने उसे यह स्वरूप दे दिया?
जब इस बात पर सूक्ष्म चिंतन करता हूँ, तो भीतर एक गहरा प्रश्न उठता है।
ज्ञानी बनकर दिखना अलग बात है,
पर ज्ञान की अवस्था में स्थिर रहकर जीना बिल्कुल अलग बात है।
यदि एक भूल से रावण का ऐसा परिणाम हुआ,
तो मैं कितनी भूलें जान-बूझकर कर जाता हूँ —
फिर मुझे क्या कहलाएगा?
ज्ञान की सच्ची अवस्था तो वह है —
जहाँ न किसी से नफ़रत हो,
न किसी से एकतरफ़ा मोह।
न वैर, न पक्षपात।
न पाने की चिंता, न खोने का भय।
न विशेष खुशी, न विशेष ग़म।
पर मैं?
कभी अपना-पराया करता हूँ,
कभी ईर्ष्या-द्वेष पालता हूँ,
कभी ग़मंड और अहंकार में भर जाता हूँ।
कभी छोटा-बड़ा, अमीर-ग़रीब का भेद करता हूँ।
कभी दूसरों की बर्बादी में अपनी आबादी देखता हूँ।
कभी अपनों पर प्रेम और परायों पर कठोरता दिखाता हूँ।
और यह सोच केवल भीतर ही नहीं रखता —
बल्कि उसे व्यवहार में भी ले आता हूँ।
तो क्या मैं सच में ज्ञानी हूँ?
या केवल ज्ञान का शब्द जानता हूँ?
शायद इसी द्वंद्व में पुकार निकलती है —
कि मेरा मुर्शिद मुझे बचा ले।
अहंकार से, भेदभाव से, झूठे मालिकाना भाव से।
मुझे उस सहज अवस्था में स्थिर कर दे,
जहाँ ज्ञान केवल विचार न हो,
बल्कि जीवन बन जाए।
