सभी जीवों में मनुष्य सबसे खतरनाक है — शक्ति के कारण नहीं, बल्कि चेतना के दुरुपयोग के कारण।
मनुष्य स्वयं को भूल चुका है।
उसने अपना वास्तविक स्वरूप खो दिया है। अंतर की शांति त्याग दी है। करुणा, प्रेम और दिव्यता अहंकार के नीचे दब गई है। उन्नति के नाम पर वह प्रभुत्व का नृत्य कर रहा है।
वह समुद्र नापता है,
आकाश चीरता है,
ग्रहों तक पहुँचता है —
पर अपने भीतर के अशांत मन को नहीं जीत पाता।
कोई अन्य जीव अपने स्वभाव से विचलित नहीं होता।
सिंह भूख के लिए शिकार करता है, घृणा के लिए नहीं।
वृक्ष बिना भेदभाव के छाया देता है।
प्रकृति अपने नियम में स्थित है।
केवल मनुष्य विभाजन करता है —
जाति, धर्म, रंग, धन, सीमाएँ।
दूसरों पर विजय पाकर स्वयं को महान घोषित करता है।
समस्या बुद्धि नहीं है — समस्या अहंकार है।
विचार शक्ति जो मुक्ति का साधन बन सकती थी, वह विनाश का अस्त्र बन गई।
इसीलिए ब्रह्म ज्ञान आवश्यक है।
ब्रह्म ज्ञान बाहरी जगत को जीतना नहीं है, भीतर के अहंकार को जीतना है।
यह मनुष्य को स्मरण कराता है:
तुम स्वामी नहीं हो।
तुम नियंत्रक नहीं हो।
तुम अलग नहीं हो।
तुम अनंत का अंश हो।
यह सृष्टि तुम्हारी संपत्ति नहीं —
तुम स्वयं उसकी एक स्वर लहर हो।
जब यह बोध जागता है,
हिंसा मिटती है,
विभाजन घटता है,
करुणा प्रकट होती है।
मनुष्य जन्म प्रभुत्व के लिए नहीं, एकत्व के बोध के लिए है।
केवल मनुष्य को ब्रह्म ज्ञान चाहिए — क्योंकि वही स्वयं को भूल गया है।
और उसी को स्मरण करना है।
