हर मनुष्य के बाहर एक सुंदर-सा चेहरा होता है,
और भीतर दो रूप छिपे होते हैं।
एक वह जो प्रेम करता है, क्षमा करता है, सहानुभूति रखता है।
जो सबको समान दृष्टि से देखता है,
और हर प्राणी में एक ही नूर पहचानता है —
वही उसका असली इंसान वाला चेहरा है।
दूसरा वह जो ईर्ष्या करता है, घृणा पालता है,
अहंकार में डूब जाता है,
मारने-मिटाने की बातें करता है,
और दूसरों की शांति छीनकर स्वयं को शक्तिशाली समझता है —
वही उसका राक्षस वाला चेहरा है।
और आश्चर्य यह है कि
इंसान पल भर में इन दोनों चेहरों को बदल लेने की कला भी जानता है।
इंसान वाला चेहरा प्रकाश की ओर ले जाता है।
वह सत्य, करुणा और संयम से भरा होता है।
वह जोड़ता है, सहारा देता है,
और बाहर ही नहीं, भीतर भी शांति उत्पन्न करता है।
राक्षस वाला चेहरा अंधकार की ओर खींचता है।
वह भ्रम, लालच और क्रोध से जन्म लेता है।
वह तोड़ता है, भड़काता है,
और अंततः स्वयं को ही नष्ट कर देता है।
इंसान यह सब भली-भाँति जानता है,
फिर भी कई बार उसी राह पर चल पड़ता है।
असल प्रश्न यह नहीं कि हमारे भीतर कौन-सा चेहरा है।
सच तो यह है कि दोनों मौजूद हैं।
प्रश्न यह है —
हम किसे पोषित करते हैं?
किसे अपनी आवाज़ बनाते हैं?
और किसे अपना असली चेहरा बनने देते हैं?
परंतु इस प्रश्न का उत्तर पाना मनुष्य के लिए इतना सरल नहीं है।
जब तक मनुष्य स्वयं को नहीं जानता,
जब तक वह यह नहीं समझता कि वह किस प्रेममय मूल तत्व से उत्पन्न हुआ है,
तब तक अपने भीतर के इस राक्षस रूपी चेहरे
और उसके कर्मों को जीवन से दूर करना लगभग असंभव है।
यहीं पर सतगुरु का मार्गदर्शन आवश्यक हो जाता है।
सतगुरु ही वह शक्ति है
जो मनुष्य को उसके भीतर छिपे राक्षस रूप को पहचानने की दृष्टि देता है,
और उस अंधकार को नष्ट करने की सामर्थ्य भी देता है।
वही मनुष्य को यह सिखाता है
कि जीवन को राक्षस वाले चेहरे और उसके कर्मों को से नहीं,
बल्कि इंसान के सहज स्वभाव के साथ।

